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Bihar News: दहेज हत्या में पति को उम्रकैद, दो बच्चों के लिए सरकार देगी हर महीने 8 हजार रुपये

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | पश्चिम चंपारण के बगहा में पत्नी की हत्या के मामले में अदालत ने पति सुभाष यादव को उम्रकैद की सजा सुनाई। दो नाबालिग बच्चों को हर महीने 4-4 हजार रुपये देने का निर्देश।

पश्चिम चंपारण, 19 अगस्त। दहेज की मांग पूरी नहीं होने पर पत्नी की हत्या के करीब छह साल पुराने मामले में बगहा की अदालत ने पति को उम्रकैद की सजा सुनाई है। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश मानवेंद्र मिश्रा की अदालत ने सुभाष यादव को अपनी पत्नी रीना देवी की हत्या का दोषी मानते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने उस पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। जुर्माना नहीं देने पर उसे छह महीने अतिरिक्त जेल में रहना होगा।

अदालत ने आरोपी को हत्या के बाद सबूत मिटाने का भी दोषी पाया। इस आरोप में उसे IPC की धारा 201 के तहत सात साल की सजा सुनाई गई है। इस मामले में भी 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है और जुर्माना नहीं भरने पर छह महीने की अतिरिक्त सजा का प्रावधान किया गया है।

यह मामला वर्ष 2020 का है। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, रीना देवी और सुभाष यादव के बीच दहेज को लेकर विवाद चल रहा था। आरोप था कि सुभाष यादव दहेज में मोटरसाइकिल और भैंस की मांग कर रहा था। मांग पूरी नहीं होने के बाद उसने पत्नी की हत्या कर दी। हत्या के बाद शव को ठिकाने लगाने और साक्ष्य मिटाने की कोशिश किए जाने का आरोप भी मामले में लगाया गया था।

मां की हत्या, पिता को उम्रकैद

इस मामले का सबसे संवेदनशील पहलू दंपति के दो नाबालिग बच्चे हैं। अदालत ने सजा सुनाते समय दोनों बच्चों की स्थिति पर विशेष ध्यान दिया। एक ओर बच्चों ने अपनी मां को खो दिया, वहीं दूसरी ओर पिता को उम्रकैद की सजा मिलने के बाद उनकी देखभाल करने वाला कोई अभिभावक नहीं बचा।

अदालत ने बच्चों के भविष्य और पालन-पोषण को ध्यान में रखते हुए बिहार सरकार को दोनों नाबालिग बच्चों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। प्रत्येक बच्चे को हर महीने चार हजार रुपये देने का आदेश दिया गया है। इस तरह दोनों बच्चों को संयुक्त रूप से हर महीने आठ हजार रुपये की सहायता मिलेगी।

अदालत का यह निर्देश केवल सजा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उस अपराध से प्रभावित हुए बच्चों के भविष्य को भी ध्यान में रखा गया। मां की हत्या और पिता के जेल जाने के बाद बच्चों के सामने पैदा हुई स्थिति को देखते हुए आर्थिक सहायता को उनके जीवन में सहारा देने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

2020 में दर्ज हुआ था मामला

अभियोजन के अनुसार, रीना देवी की हत्या के बाद उसकी मां मंजू देवी ने धनहा थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। इसी शिकायत के आधार पर 30 जुलाई 2020 को मामला दर्ज किया गया था। पुलिस ने जांच के दौरान हत्या और उसके बाद साक्ष्य मिटाने से जुड़े आरोपों की पड़ताल की।

जांच के दौरान पुलिस ने मामले से संबंधित साक्ष्य जुटाए और गवाहों के बयान दर्ज किए। अभियोजन पक्ष ने सुनवाई के दौरान इन्हीं साक्ष्यों और गवाहों के बयानों को अदालत के सामने रखा।

अभियोजन की ओर से अपर लोक अभियोजक मन्नू राव ने अदालत में मामले की पैरवी की। अभियोजन पक्ष के मुताबिक सुनवाई के दौरान पेश किए गए गवाहों ने घटना से संबंधित आरोपों का समर्थन किया। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का मूल्यांकन करने के बाद आरोपी को दोषी माना।

दहेज को लेकर विवाद का आरोप

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन ने यह पक्ष रखा कि पति-पत्नी के बीच दहेज को लेकर अक्सर विवाद होता था। आरोप के मुताबिक सुभाष यादव मोटरसाइकिल और भैंस की मांग कर रहा था। मांग पूरी नहीं होने पर विवाद बढ़ा और पत्नी की हत्या कर दी गई।

इसके बाद आरोपी पर हत्या के सबूत मिटाने की कोशिश का भी आरोप लगाया गया। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हत्या के साथ-साथ साक्ष्य मिटाने के आरोप में भी दोषसिद्धि की।

हत्या के बाद सबूत मिटाने का भी दोष

अदालत द्वारा सुनाई गई सजा में IPC की धारा 201 के तहत सात साल का कारावास भी शामिल है। इस धारा के तहत अपराध के साक्ष्य को गायब करने या अपराधी को बचाने के लिए सबूत मिटाने से संबंधित प्रावधान हैं।

इस मामले में अदालत ने हत्या के आरोप में उम्रकैद और साक्ष्य मिटाने के मामले में सात वर्ष की सजा सुनाई है। दोनों मामलों में अलग-अलग जुर्माना भी लगाया गया है।

अदालत के फैसले से बच्चों को मिला आर्थिक सहारा

अदालत के फैसले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा दोनों नाबालिग बच्चों के लिए आर्थिक सहायता का निर्देश है। अदालत ने बिहार सरकार को दोनों बच्चों को हर महीने चार-चार हजार रुपये देने को कहा है। यानी दोनों बच्चों को मिलाकर आठ हजार रुपये प्रतिमाह की सहायता मिलेगी।

इससे बच्चों के पालन-पोषण और भविष्य की जरूरतों में मदद मिलने की उम्मीद है। अदालत ने यह निर्देश ऐसे समय दिया है जब परिवार में मां की मौत हो चुकी है और पिता को आजीवन कारावास की सजा हो गई है।

दहेज हत्या का यह मामला एक बार फिर यह सवाल सामने लाता है कि शादी के बाद दहेज को लेकर होने वाले विवाद किस तरह गंभीर अपराध का रूप ले सकते हैं। अदालत का फैसला दोषसिद्धि और सजा के साथ उन दो बच्चों की स्थिति को भी केंद्र में रखता है, जिनका जीवन इस घटना से पूरी तरह बदल गया।

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सजा के साथ बच्चों के भविष्य की चिंता भी जरूरी

बगहा की अदालत का यह फैसला केवल एक दहेज हत्या के मामले में सजा सुनाने तक सीमित नहीं है। इस फैसले में उन दो नाबालिग बच्चों की स्थिति को भी गंभीरता से लिया गया है, जिन्होंने अपनी मां को खो दिया और अब पिता के जेल जाने के बाद अभिभावकीय संरक्षण से भी वंचित हो गए हैं।

दहेज के नाम पर होने वाली हिंसा का सबसे बड़ा असर अक्सर परिवार के बच्चों पर पड़ता है। वे न केवल अपने माता-पिता में से किसी एक को खोते हैं, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था भी प्रभावित होती है। ऐसे मामलों में दोषी को कानून के अनुसार सजा मिलना जरूरी है, लेकिन पीड़ित परिवार के बच्चों की शिक्षा, पालन-पोषण और भविष्य की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

अदालत द्वारा दोनों बच्चों को हर महीने चार-चार हजार रुपये की सहायता का निर्देश इसी मानवीय पक्ष को सामने लाता है। यह सहायता राशि उनके जीवन की सभी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त हो या न हो, लेकिन संकट की स्थिति में यह एक संस्थागत सहारा जरूर बन सकती है।

दहेज हत्या जैसे मामलों को रोकने के लिए केवल घटना के बाद सजा पर्याप्त नहीं है। परिवारों और समाज को भी दहेज की मांग के खिलाफ स्पष्ट रुख अपनाना होगा। शादी को आर्थिक लेनदेन का माध्यम बनाने की सोच बदलना ही ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने का स्थायी रास्ता है।

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